इतिहास

सिवनी जिले का इतिहास 

 

सिवनी जिले के नामकरण के संबंध में जिले में अनेक दंतकथायें एवं धारणायें प्रचलित है। इतिहास के पृष्ठों में यह जिला मंडला के गौंड राजाओं के 52 गंढों में से एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। नगर मुख्यालय में तीन गढ चावडी, छपारा और आदेगांव प्रमुख थे। गौंड राजाओं के पतन के पश्चात सन 1700 ई. में नागपुर के भोसले के साम्राज्य के अधीन आ गया। सत्ता का केन्द्र छपारा ही था। सन् 1774 में छपारा से बदलकर मुख्यालय सिवनी हो गया। इसी समय दीवानगढी का निर्माण हुआ और सन् 1853 में मराठों के पतन एवं रघ्घुजी तृतीय की मृत्यु  निःसंतान होने के कारण यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव में आ गया। सन् 1857 की क्रान्ति के पश्चात कम्पनी का समस्त शासन ब्रिटिश हुकूमत के अधीन हो गया। मुख्यालय में दीवान साहब का सिवनी ग्राम, मंगलीपेठ एवं भैरोगंज ग्राम मिलकर सिवनी नगर बना। इसके बाद सन् 1867 में सिवनी नगरपालिका का गठन हुआ। सिवनी में वनोपज हर्रा, बहेडा, आंवला एवं महुआ बहुतायात में होता है। महुआ का अधिक उत्पादन होने के कारण सन् 1902 में डिस्लरी का निर्माण हुआ। सन् 1909 तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर श्लोकाक विस्तार करते हुए रेल्वे लाईन का विचार किया। सन् 1904 में बंगाल नागपुर नैरोगेज रेल्वे का आगमन हुआ। सन् 1938 में बिजली घर के निर्माण ने नगर में एक नये युग का सूत्रपात किया। नगर की गलियां और घर बिजली की रोशनी से जगमगा उठे।
सन् 1939 से 1945 के मध्य द्वितीय विश्व युद्व ने अंग्रेजी साम्राज्य की जडे हिला दी।
नागपुर से जबलपुर एन.एच. 7 के मध्य सिवनी ना केवल प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था बल्कि जंगल अधिक होने के कारण अंग्रेजों के लिए सुरक्षित स्थान भी था। महात्मा गांधी के अथक प्रयासों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अमर बलिदान से 15 अगस्त 1947 को हमारा देश स्वतंत्र हुआ।
सिवनी जिला सन् 1956 में पुनः जिला बना। जिला बनने पर प्रथम कलेक्टर श्री ए.एस. खान पदस्थ हुए। हमारा अतीत गौरवशाली रहा है, वर्तमान में अनेक उतार चढाव देखने के पश्चात भी इस जिले में अपनी विकास यात्रा जारी रखी है। जिले में अनेक सपूतों ने अपनी यशगाथा प्रदेश, देश और विदेश में फैलाई है। उनमें परम पूज्य द्विपीठाधीश्वर जगत गुरू शंकराचार्य, स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज का नाम प्रमुख है।
प्रथम धारणा
सिवनी नगर का नाम सिवनी क्यों पडा इस संबंध में प्रथम धारणा यह है कि यहां कभी सेवन वृक्षों का बाहुल्य था। कदाचित इसी कारण इस नगर का नाम सिवनी पडा है। आज भी जिले में यत्र-तत्र सेवन के वृक्ष पाये जाते है।
द्वितीय धारणा
शैव मत के अनुयायी शिव भक्तों का बाहुल्य एवं भगवान शिव के इष्टदेव के रूप में पूजा अर्चना की अधिकता के कारण इस नगर का नाम शिवनी था, कलान्तर में इसका रूप बिगडकर अप्रभ्रंश होने के बाद सिवनी हो गया होगा।
तृतीय धारणा
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लिए हुए तीसरी धारण यह है कि वीरगाथा काल (सम्वत् 1050 से 1375 तक) में नैनागढ के गोंड राजा इन्दरमन (इन्द्रमन) की बहिन सोना रानी अनुपम सुन्दरी थी। सोना रानी हिर्री नदी विकासखंड केवलारी ग्राम अमोदागढ के पास ग्राम  खोहगढ में अपने भाई के साथ रहती थी। वीर भोग्या वसुन्धरा की उक्ति के अनुसार तत्कालीन राजधरानों की परम्परानुसार वीरता को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। अतः सोनारानी जब जवान हुई तो उसके पिता श्री सोमदेव ने उसकी शादी के लिये एक शर्त रखी कि जो वीर शेर से लडने की क्षमता रखता हो उसे ही सोना रानी का विवाह किया जायेगा।
आल्हा एवं उदल महोबा चंदेल राजा परमरद (राजा परमाल) के महान पराक्रमी योद्वा (सेनानायक) थे। ये बनाफ र क्षत्रिय थे। अनुज ऊदल की इच्छा थी कि अल्हा का विवाह सोना रानी से हो। अतः उदल ने अपने बडे भाई आल्हा को सोना रानी से विवाह कराने की सलाह दी। आल्हा ने कहा कि नैनागढ का राजा बहुत ही बलशाली है तथा उसके पास अस्त्र-शस्त्र भी बहुत है। उसने सोना से विवाह करने की इच्छा से आये 52 वीरवरों को बंदी बनाया लिया है। अतः आल्हा ने विषम परिस्थिति को भांप कर मना कर दिया, किन्तु उदल हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने हमला बोल दिया। इन्दरमन के साथ घमासान युद्व हुआ और ऊदल जीतकर सोना रानी को ले गाया। तत्पश्चात आल्हा के साथ सोना रानी का विवाह सम्पन्न हुआ। सोना रानी के नाम पर इस नगर का नाम सिवनी पडा।
चतुर्थ धारणा
एक धारणा यह भी है कि संभवतः आद्य शंकराचार्य दक्षिण दिशा से उत्तर भारत की यात्रा करते हुए जब यहां से निकले तो यहां की प्राकृतिक सम्पदा से प्रभाविक होकर उन्होंने इसे श्रीवनी के नाम से विभूषित किया। इसीलिये इसे सिवनी के नाम से जानते है।
पंचम धारणा
श्रीवनी का अर्थ होता है बेल के फलों का वन। इसके पत्ते शिवलिंग पर चढाते हैं और लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इसके फल यज्ञ हवन में काम आते है। सिवनी नगर में बेल के वनों की अधिकता के कारण इसका नाम श्रीवनी पडा हो और संभव है कालान्तर में अप्रभ्रंश होकर इसका नाम सिवनी हो गया।
षष्टम् धारणा
मुगलों का आक्रमण जब गढ मंडला में हुआ तब उस आक्रमण को विफल करने के लिए नागपुर से राजा भोसले की सेना और गढ मंडला से गोंड राजा की सेना गढ छपारा में आकर रूकी । सेना के रूकने के स्थान को छावनी कहा जाता है सेना के रूकने के क्षेत्र धूमा, लखनादौन,छपारा सिवनी, खवासा रहे है। चूंकि सिवनी सैनिकों के लिए सर्वसुविधा युक्त स्थान था। अतः कुछ अंग्रेज विद्वानों का मत है कि यह विशाल सैनिक क्षेत्र छावनी रहा है। कालान्तर में छावनी का अपभ्रंश रूप सिवनी हो गया।
उपर्युक्त विभिन्न धारणाओं के बीच सिवनी नगर के नामकरण के साथ कौन सी धारणा सत्य है इसका निर्णय नीर क्षीर विवेकी प्रबुद्व सुधी पाठकों पर ही छोडना उचित है।
प्राचीन काल में भारत में इतिहास लेखन की कोई सुव्यवस्थित परम्परा नही थी। अतः सिवनी क्षेत्र का भी प्राचीन काल का कोई क्रमबद्व इतिहास उपलब्ध नहीं है। यंत्र-तत्र बिखरी जो कुछ अल्प सामग्री प्राप्त है उसके आधार पर लगभग तीसरी शताब्दी से ही संक्षिप्त इतिहास की रूपरेखा निर्धारित की जा सकती है।